अहमदाबाद नगर निगम द्वारा सिविल अस्पताल के गेट नंबर-2 के पास करीब एक किलोमीटर लंबी सड़क को ‘सुरेंद्रसिंह एन. राजपूत मार्ग’ अहमदाबाद की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे पूर्व विधायक सुरेंद्रसिंह नेत्रपालसिंह राजपूत के नाम पर शाहीबाग क्षेत्र में सड़क का नामकरण अब केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रह गया है। अहमदाबाद नगर निगम द्वारा सिविल अस्पताल के गेट नंबर-2 के पास करीब एक किलोमीटर लंबी सड़क को ‘सुरेंद्र सिंह एन. राजपूत मार्ग’ नामकरण समारोह 21 अगस्त को प्रस्तावित कार्यक्रम में अहमदाबाद के महापौर हितेश बारोट मुख्य अतिथि। राज्य मंत्री दर्शनाबेन वाघेला, सांसद दिनेश मकवाना, अहमदाबाद नगर निगम स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन कमलेश पटेल सहित अन्य जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने किया गया है।
कांग्रेस से दो बार विधायक, फिर भाजपा में शामिल हुए सुरेंद्र राजपूत का राजनीतिक सफर गुजरात की दलगत राजनीति के बदलावों का भी एक उदाहरण रहा है। वे 1976-80 अहमदाबाद नगर निगम रहे। 1980-85 और 1985-90 के दौरान विधायक रहे। 1989 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अहमदाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, जहां उनका मुकाबला भाजपा के हरिन पाठक से हुआ।
राजपूत लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे और गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष तथा एआईसीसी प्रतिनिधि भी रहे। 2014 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। उस समय उनके भाजपा में शामिल होने की खबर राष्ट्रीय स्तर पर भी सामने आई थी। भाजपा में शामिल होते समय राजपूत ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को देश के लिए आवश्यक बताते हुए अपने निर्णय की घोषणा की थी।
यही राजनीतिक यात्रा आज सड़क के नामकरण को खास बना रही है—एक ऐसा नेता जिसने अपने राजनीतिक जीवन का बड़ा हिस्सा कांग्रेस में बिताया और बाद के दौर में भाजपा में शामिल हुआ, अब भाजपा शासन वाले गुजरात में सार्वजनिक मार्ग के नाम के रूप में सम्मानित किया जा रहा है।
सुरेंद्र राजपूत की पहचान केवल किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नेता के तौर पर नहीं रही। अहमदाबाद की राजनीति में वे ऐसे नेताओं में गिने जाते रहे, जिनके विभिन्न राजनीतिक धाराओं के नेताओं से व्यक्तिगत संपर्क और संबंध रहे।
उनकी राजनीतिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण दौर राजीव गांधी के समय से जुड़ा रहा। 2014 में भाजपा में शामिल होने के बावजूद उनका पुराना राजनीतिक परिचय और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े उनके संबंध सार्वजनिक राजनीतिक जीवन का हिस्सा रहे हैं। इसी वजह से उनके नाम पर सड़क का नामकरण कांग्रेस और भाजपा—दोनों राजनीतिक खेमों में अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है।
राजपूत परिवार की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया है कि उन्हें केवल हिंदीभाषी समाज के नेता के रूप में सीमित करना उचित नहीं होगा। उनके बेटे स्वप्निल राजपूत के अनुसार, उनके पिता की राजनीतिक पहचान सभी वर्गों से संपर्क रखने वाले नेता की रही और उन्हें किसी एक समुदाय तक सीमित करके देखना सही नहीं होगा।
‘परप्रांतीय नेता’ से आगे गुजरात की राजनीति में अपनी जगह
सुरेंद्र राजपूत मूल रूप से हिंदीभाषी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद गुजरात की चुनावी और संगठनात्मक राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे। दो बार विधानसभा पहुंचना और बाद में लोकसभा चुनाव लड़ना बताता है कि उनकी राजनीतिक सक्रियता केवल किसी एक भाषाई समूह तक सीमित नहीं थी। 1989 के लोकसभा चुनाव में अहमदाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर उनकी उम्मीदवारी इसका सार्वजनिक चुनावी रिकॉर्ड भी है।
इसी संदर्भ में सड़क का नामकरण राजनीतिक रूप से एक अलग संदेश देता दिखाई देता है—गुजरात की राजनीति में हिंदीभाषी पृष्ठभूमि से आए ऐसे नेता को सार्वजनिक स्थान के नाम के जरिए सम्मान देना, जिसकी राजनीतिक पहचान स्थानीय सीमाओं से आगे विभिन्न राजनीतिक नेताओं और वर्गों तक रही।
भाजपा शासन में कांग्रेस पृष्ठभूमि वाले नेता को सम्मान
मोदी से व्यक्तिगत संबंधों की चर्चा भी इसी संदर्भ में
राजपूत के राजनीतिक जीवन का एक पहलू विभिन्न दलों के वरिष्ठ नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंधों को लेकर भी रहा है। उनके परिवार और परिचितों के अनुसार, राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यक्तिगत संबंधों को बनाए रखना उनकी शैली का हिस्सा था।
इसी संदर्भ में नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान राजपूत परिवार के सामाजिक एवं पारिवारिक कार्यक्रमों में उनकी उपस्थिति का उल्लेख भी किया जाता रहा है। हालांकि ऐसे व्यक्तिगत संबंधों को किसी राजनीतिक निर्णय का प्रत्यक्ष कारण मानने के बजाय इसे राजपूत की व्यापक राजनीतिक संपर्क शैली के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
गुजरात की राजनीति में माधवसिंह सोलंकी, अमरसिंह चौधरी सहित कई बड़े नेताओं की विरासत पर समय-समय पर सार्वजनिक स्मारकों और स्थलों के नामकरण को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में सुरेंद्र राजपूत के नाम पर सड़क का नामकरण यह सवाल भी सामने लाता है कि सार्वजनिक स्थलों के नामकरण में राजनीतिक योगदान, सामाजिक स्वीकार्यता और दलगत सीमाओं से परे सार्वजनिक जीवन की भूमिका को कितना महत्व दिया जाता है।
हालांकि यह भी स्पष्ट है कि किसी सड़क का नामकरण अपने आप में किसी राजनीतिक दल की चुनावी रणनीति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसे राजनीतिक संदेश के रूप में देखने के लिए संबंधित निर्णय लेने वाले निकाय की आधिकारिक वजह और स्थानीय राजनीतिक संदर्भ भी महत्वपूर्ण होंगे।
सियासी तौर पर इस नामकरण की सबसे बड़ी खासियत यही है कि सुरेंद्र राजपूत की पहचान किसी एक दल के नेता के रूप में नहीं, बल्कि गुजरात की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहे ऐसे जमीनी नेता के रूप में सामने आती है, जिनके राजनीतिक संबंध दलों की सीमाओं से आगे तक फैले रहे।
यही वजह है कि शाहीबाग की इस सड़क का नामकरण केवल एक सड़क के नाम बदलने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि गुजरात की बदलती राजनीति में पुरानी राजनीतिक पीढ़ी, व्यक्तिगत संबंधों और दलगत सीमाओं से परे स्वीकार्यता पर बहस का नया अवसर बन गया है।





